वाशिंगटन। (आलोक शर्मा) हाल ही में ईरान पर संयुक्त राज्य अमेरिका की सैन्य कार्रवाई को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। कई देशों, विश्लेषकों और मानवाधिकार संगठनों ने इस कदम की आलोचना की है। इस निंदा के पीछे कई राजनीतिक, कानूनी और मानवीय कारण बताए जा रहे हैं।
सबसे बड़ा मुद्दा अंतरराष्ट्रीय कानून और संप्रभुता का है। आलोचकों का कहना है कि किसी भी देश पर सैन्य हमला तभी उचित माना जाता है जब वह आत्मरक्षा की स्पष्ट स्थिति में हो या उसे अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की मंजूरी प्राप्त हो। यदि यह कार्रवाई एकतरफा मानी जाती है, तो इससे वैश्विक नियमों और संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होते हैं।
दूसरा कारण क्षेत्रीय अस्थिरता का खतरा है। मध्य पूर्व पहले से ही राजनीतिक तनाव और संघर्षों से प्रभावित रहा है। ऐसे में किसी बड़े देश की सीधी सैन्य कार्रवाई से व्यापक टकराव, प्रतिशोधी हमले या युद्ध की आशंका बढ़ सकती है। इसका असर तेल आपूर्ति, समुद्री व्यापार मार्गों और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी पड़ सकता है।
वियतनाम युद्ध: कैसे अमेरिका की सबसे लंबी लड़ाई बनी उसकी सबसे बड़ी रणनीतिक हार
तीसरा महत्वपूर्ण पहलू मानवीय चिंता है। युद्ध या सैन्य हमलों का सीधा असर आम नागरिकों पर पड़ता है। बुनियादी ढांचे को नुकसान, विस्थापन और आर्थिक संकट जैसी समस्याएं पैदा हो सकती हैं। मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि किसी भी कार्रवाई में नागरिक सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
हालांकि अमेरिकी पक्ष का तर्क है कि यह कदम सुरक्षा खतरों को रोकने और अपने हितों की रक्षा के लिए उठाया गया। इसके बावजूद, अंतरराष्ट्रीय समुदाय में इस बात पर बहस जारी है कि क्या यह कार्रवाई आवश्यक थी या इससे तनाव और बढ़ेगा। यही वजह है कि ईरान पर अमेरिकी हमले की व्यापक निंदा हो रही है।
विरोध का कारण यहीं नहीं थम रहा इसके पीछे अमेरिका के इतिहास को भी नजर अंदाज नहीं किया जा सकता। जहां दुनियाभर में कहा जाता है कि अमेरिका दुनिया में “खुली दादागीरी” करता है।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में अक्सर यह आरोप लगाया जाता है कि संयुक्त राज्य अमेरिका वैश्विक स्तर पर अपनी शक्ति का आक्रामक इस्तेमाल करता है। “खुली दादागीरी” शब्द राजनीतिक बयानबाजी का हिस्सा है, लेकिन इसकी जड़ें इतिहास और अमेरिकी विदेश नीति के कई महत्वपूर्ण फैसलों में मिलती हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिका आर्थिक और सैन्य रूप से दुनिया की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरा। सोवियत संघ के पतन के बाद वह एकमात्र महाशक्ति रह गया, जिससे वैश्विक संस्थाओं, डॉलर और सैन्य गठबंधनों पर उसका प्रभाव और बढ़ गया। इसी बढ़ती शक्ति ने उसे विश्व राजनीति में निर्णायक भूमिका दी, लेकिन साथ ही आलोचनाओं को भी जन्म दिया।
शीत युद्ध के दौर में अमेरिका ने साम्यवाद को रोकने के नाम पर कई देशों में हस्तक्षेप किया। वियतनाम युद्ध इसका प्रमुख उदाहरण है, जहां लंबे सैन्य संघर्ष और भारी जनहानि के बाद अमेरिका को पीछे हटना पड़ा। इसके बाद 2003 का इराक युद्ध भी विवादों में रहा, क्योंकि जिस आधार पर हमला किया गया — यानी व्यापक विनाश के हथियार — वे बाद में नहीं मिले। इससे अमेरिका की विश्वसनीयता पर सवाल उठे। इसी तरह अफगानिस्तान युद्ध, जो 9/11 हमलों के बाद शुरू हुआ, दो दशकों तक चला और अंततः अमेरिकी सेना की वापसी के साथ समाप्त हुआ, लेकिन स्थायी शांति स्थापित नहीं हो सकी।
मध्य-पूर्व में अमेरिकी सक्रियता को भी कई विश्लेषक तेल और सामरिक हितों से जोड़ते हैं। मध्य पूर्व में बार-बार सैन्य और राजनीतिक हस्तक्षेप से यह धारणा बनी कि अमेरिका अपने आर्थिक और रणनीतिक हितों की रक्षा के लिए कठोर कदम उठाने से पीछे नहीं हटता। इसके अलावा, आर्थिक प्रतिबंधों का व्यापक उपयोग भी उसकी नीति का अहम हिस्सा रहा है। ईरान और रूस जैसे देशों पर लगाए गए प्रतिबंधों को आलोचक “आर्थिक दबाव की राजनीति” कहते हैं, क्योंकि इनका असर आम नागरिकों पर भी पड़ता है।
हालांकि, अमेरिका और उसके समर्थक देशों का तर्क है कि वह वैश्विक सुरक्षा और स्थिरता बनाए रखने में भूमिका निभाता है। NATO जैसे सैन्य गठबंधन उसके नेतृत्व में काम करते हैं और आतंकवाद या आक्रामक शासन के खिलाफ कार्रवाई को वे अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा का हिस्सा मानते हैं। इसलिए जो एक पक्ष “दादागीरी” कहता है, दूसरा उसे “वैश्विक नेतृत्व” या “जिम्मेदारी” बताता है। सच यह है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति शक्ति संतुलन पर आधारित होती है, और इतिहास में लगभग हर महाशक्ति पर ऐसे आरोप लगते रहे हैं।
कुल मिलाकर देखा जाए तो अमेरिका को “दुनिया का दादागीर” कहना एक दृष्टिकोण है, जो उसके सैन्य हस्तक्षेप, आर्थिक प्रतिबंधों और वैश्विक प्रभाव से जुड़ा है। वहीं समर्थकों के अनुसार वह वैश्विक व्यवस्था का संरक्षक है। वास्तविकता इन दोनों ध्रुवों के बीच कहीं स्थित है, जहां राष्ट्रीय हित, वैश्विक राजनीति और नैतिक दावों का जटिल संतुलन काम करता है।
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