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5 दिन का विराम या रणनीतिक चाल? अमेरिका-ईरान तनाव पर उठते सवाल

मध्य-पूर्व की राजनीति एक बार फिर अनिश्चितता के दौर में है। हाल ही में United States ने Iran पर अगले 5 दिनों तक हमला न करने की घोषणा की है। इस फैसले के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बहस तेज हो गई है—क्या यह वास्तव में युद्ध विराम की दिशा में कदम है या केवल एक रणनीतिक विराम? कुछ विश्लेषक इसे पूर्व राष्ट्रपति Donald Trump की संभावित राजनीतिक चाल के रूप में भी देख रहे हैं। क्या यह सच में युद्ध विराम है? सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि “हमला न करने की घोषणा” और “औपचारिक युद्ध विराम” (Ceasefire) दो अलग-अलग चीजें हैं। युद्ध विराम आमतौर पर दोनों पक्षों की सहमति से होता है और इसमें शर्तें तय होती हैं। एकतरफा हमला रोकने की घोषणा केवल सामरिक (tactical) निर्णय भी हो सकता है। इस मामले में अभी तक ऐसी कोई पुष्टि नहीं है कि ईरान ने भी औपचारिक रूप से जवाबी कार्...

ईरान की फायर रेंज से दूर मीडिल ईस्ट में अमेरिका खेल रहा “सेफ गेम”? संघर्ष की भट्टी में तप रहे पड़ोसी मुल्क

वॉशिंगटन। (आलोक शर्मा) मध्य-पूर्व के तनाव में अक्सर यह धारणा बनती है कि अमेरिका सीधे ईरान की फायर रेंज से बाहर रहकर “सेफ गेम” खेल रहा है। दरअसल, यह स्थिति कई सैन्य, तकनीकी और कूटनीतिक परतों का परिणाम है। और हाल में चल रहे ईरान वॉर में भी यही साबित हो रहा है। पहले की तरह ही मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच यह सवाल बार-बार उठ रहा है कि अमेरिका सीधे ईरान की फायर रेंज में क्यों नहीं दिखता, जबकि जवाबी कार्रवाई अधिकतर पड़ोसी देशों या क्षेत्रीय ठिकानों के आसपास ही हो रही है। दरअसल, यह दूरी संयोग नहीं बल्कि रणनीति है। अमेरिका अपनी सैन्य मौजूदगी को इस तरह तैनात करता है कि वह सीधे हमले की जद से बाहर रहे, लेकिन जरूरत पड़ने पर तेज और सटीक जवाब देने की क्षमता भी बनाए रखे। यानि खुद एक सेफ गेम खेलता है और दूसरे मुल्कों के कंधे पर बंदूर रखकर चलाने की पुरानी आदत है। ऐसा ही मीडिल ईस्ट वॉर में दे...

सुपरपावर से सुपर कंट्रोवर्सी तक: क्यों घिरा है अमेरिका ‘दादागीरी’ के आरोपों में?

​वाशिंगटन। (आलोक शर्मा) हाल ही में ईरान पर संयुक्त राज्य अमेरिका की सैन्य कार्रवाई को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तीखी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। कई देशों, विश्लेषकों और मानवाधिकार संगठनों ने इस कदम की आलोचना की है। इस निंदा के पीछे कई राजनीतिक, कानूनी और मानवीय कारण बताए जा रहे हैं। सबसे बड़ा मुद्दा अंतरराष्ट्रीय कानून और संप्रभुता का है। आलोचकों का कहना है कि किसी भी देश पर सैन्य हमला तभी उचित माना जाता है जब वह आत्मरक्षा की स्पष्ट स्थिति में हो या उसे अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की मंजूरी प्राप्त हो। यदि यह कार्रवाई एकतरफा मानी जाती है, तो इससे वैश्विक नियमों और संयुक्त राष्ट्र व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े होते हैं। दूसरा कारण क्षेत्रीय अस्थिरता का खतरा है। मध्य पूर्व पहले से ही राजनीतिक तनाव और संघर्षों से प्रभावित रहा है। ऐसे में किसी बड़े देश की सीधी सैन्य कार्रवाई से व...

वियतनाम युद्ध: कैसे अमेरिका की सबसे लंबी लड़ाई बनी उसकी सबसे बड़ी रणनीतिक हार

US-Israel Attacks Iran : (आलोक शर्मा) क्या ट्रंप की हठधर्मिता अमेरिका के नाम वियतनाम युद्ध जैसी एक और रणनीतिक असफलता की कहानी लिखने जा रही है। विदेश और युद्ध मामलों के जानकार लगातार यह सवाल उठा रहे हैं। कारण साफ है जिस ईरान में अमेरिका इजरायल के साथ 2 से 3 तीन के युद्ध को ध्यान में रखकर आगे बढा था अब वही युद्ध एक माह से ज्यादा चलने की आशंका जताई जाने लगी है। ट्रंप अपने इरादों में सफल हो या न हों लेकिन मीडिल ईस्ट के कई देशों को ट्रंप की हठधर्मिता ने बैठे बिठाएं युद्ध में धकेल दिया है, जबकि अमेरिका खुद के देश को इससे बचाए हुए हजारों किलामीटर दूर बैठा हुआ है। उसके देश में अभी तक एक भी ईरानी हमला नहीं हुआ है या यों कहें उसकी सीमाओं के आसपास भी नहीं पहुंचा है। लेकिन क्या सिर्फ हठधर्मिता के चलते ट्रंप ने एक गलत समय पर एक गलत फैसला कर लिया जिसे अब वह लाखों करोड़ों लोगों की जान युद्ध में धकेल...

हिंद महासागर में ईरान पर ट्रैजिक स्ट्राइक, 80 लोगों की मौत

ग्लोबल तनाव और मध्य-पूर्व संघर्ष के बीच अंतरराष्ट्रीय समुद्र में एक बड़ा सैन्य घटनाक्रम हुआ है। एक अमेरिकी पनडुब्बी ने ईरानी युद्धपोत IRIS Dena को हिंद महासागर में टॉरपीडो से डुबा दिया, जिससे कम से कम 80 ईरानी नौसैनिक मारे गए और दर्जनों लापता हैं। यह घटना श्रीलंका के दक्षिणी तट के पास हुई, अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्र में जहां दोनों देश सक्रिय तौर पर तैनात थे। साथ ही, अमेरिकी रक्षा अधिकारियों ने यह भी बताया कि इस तरह का पनडुब्बी से टॉरपीडो हमला किसी अन्य युद्धपोत पर किए गए महत्वाकांक्षी हमले के बाद पहली बार हुआ है — 1945 के बाद. क्या था IRIS Dena? IRIS Dena एक Moudge-class फ्रिगेट है — ईरान की नौसेना का आधुनिक युद्धपोत — जिसमें लगभग 180 नाविक सवार थे। यह जहाज भारत के विशाखापत्तनम में आयोजित बहुराष्ट्रीय युद्धाभ्यास MILAN 2026 में भाग लेने के बाद अपने देश लौट रहा था...

दुबई में धमाकों के बाद भारतीय रियल एस्टेट बाजार को मिलेगा फायदा, जानें क्यों होने लगी जयपुर और जेडीए की चर्चा?

जयपुर/दुबई. (आलोक शर्मा) दुनिया की सबसे ऊंची इमारत Burj Khalifa के आसपास धमाकों और प्रतिष्ठित Palm Jumeirah इलाके में मिसाइल हमलों की खबरों ने वैश्विक निवेशकों को चौंका दिया है। वर्षों से सुरक्षित निवेश और लग्जरी लाइफस्टाइल का प्रतीक रहा दुबई अचानक अस्थिरता के घेरे में नजर आने लगा है। अब बड़ा सवाल यह है—क्या इस बदले माहौल का फायदा भारत को मिल सकता है? क्या दुबई से निकलने वाला निवेश भारतीय रियल एस्टेट बाजार की ओर रुख करेगा? आइए समझते हैं पूरे समीकरण को। दुबई पर हमला क्यों है बड़ी बात? दुबई को लंबे समय से मध्य पूर्व का सबसे स्थिर और सुरक्षित निवेश केंद्र माना जाता रहा है। जियोपॉलिटिकल तनाव के बावजूद UAE का रियल एस्टेट बाजार अपेक्षाकृत अछूता रहता था। लेकिन हालिया घटनाओं ने “सेफ हेवन” की उस छवि को झटका दिया है। कई रियल एस्टेट कंपनियों ने अस्थायी रूप से ...

ईरान का अमेरिका से वार्ता से इनकार, ‘दोनों को सबक सिखाने’ की चेतावनी

तेहरान/वॉशिंगटन ईरान के राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद प्रमुख अली लारीजानी ने अमेरिका के साथ किसी भी तरह की बातचीत से साफ इनकार कर दिया है। उन्होंने कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में ईरान वॉशिंगटन से वार्ता नहीं करेगा और अमेरिका तथा इज़रायल को “सबक सिखाने” के लिए तैयार है। लारीजानी का आरोप है कि अमेरिका ने युद्ध से पहले बातचीत का दिखावा करते हुए ईरान को भ्रमित किया और फिर अचानक सैन्य कार्रवाई की। उनके मुताबिक, इस घटनाक्रम के बाद अमेरिका पर भरोसा करना संभव नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ईरान “दबाव या दादागीरी के आगे झुकने वाला नहीं है” और अपनी संप्रभुता की रक्षा के लिए हर स्तर पर जवाब देगा। व्हाइट हाउस का दावा – ‘नया नेतृत्व बातचीत को तैयार’ दूसरी ओर, व्हाइट हाउस के एक वरिष्ठ अधिकारी ने रविवार (1 मार्च 2026) को दावा किया कि ईरान के “संभा...

मिडिल ईस्ट की जंग में फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी की एंट्री, इजराइल और अमेरिका के साथ ईरान का संघर्ष तेज 

इज़राइल ने लेबनान में ईरान-समर्थित हिज़बुल्लाह के ठिकानों पर एयर स्ट्राइक की है, क्योंकि हिज़बुल्लाह ने मिसाइल और ड्रोन से जवाब दिया। इससे इलाके में संघर्ष और फैल रहा है। इज़राइल ने बेरूत और दक्षिण लेबनान में हिज़बुल्लाह के किलेबंद इलाकों को निशाना बनाया है, जिससे अरब देशों में भी चिंता बढ़ी है। बडी बात यह है कि मीडिल ईस्ट की जंग में अब फ्रांस की भी एंट्री हो गई है। फ्रांस, ब्रिटेन, जर्मनी इस युद्ध में आगे आए हैं।  ब्रिटिश प्रधानमंत्री किएर स्टार्मर ने कहा है कि ब्रिटेन ने किसी भी अमेरिकी-इज़राइली हमले में हिस्सा नहीं लिया। लेकिन देश ने मिडिल ईस्ट में अपनी सैन्य मौजूदगी बढ़ा दी है ताकि क्षेत्रीय रक्षा-सुरक्षा और ब्रिटिश नागरिकों की रक्षा की जा सके। उन्होंने कहा कि ब्रिटेन ने यूएस को अपने मिलिट्री बेस (अड्डों) का उपयोग करने की इजाजत दी है ताकि ईरानी मिसाइलों को रोकने में मदद मिल स...

भारतीय सामान पर 50% टैरिफ: क्या अमेरिका खुद झेलेगा महंगाई की मार?

नई दिल्ली (आलोक शर्मा) अमेरिका और भारत के बीच आर्थिक संबंधों में हाल ही में एक नई चुनौती सामने आई है। अमेरिका ने कुछ भारतीय उत्पादों पर 50% तक का आयात शुल्क (टैरिफ) लगाने का फैसला किया है। यह कदम अमेरिका की घरेलू उद्योगों को संरक्षण देने के लिए उठाया गया है, लेकिन इसका असर केवल भारत पर नहीं बल्कि अमेरिका के खुद के बाजार और उपभोक्ताओं पर भी पड़ेगा। 1. क्या है यह टैरिफ और किन उत्पादों पर लागू है? अमेरिका ने यह टैरिफ मुख्यतः स्टील, एल्यूमिनियम, फार्मास्यूटिकल्स, टेक्सटाइल्स, और इलेक्ट्रॉनिक सामानों पर लगाया है। ये वे उत्पाद हैं जो बड़ी मात्रा में भारत से अमेरिका को निर्यात किए जाते हैं और अमेरिका में इनकी मांग भी स्थिर बनी रहती है। 2. अमेरिका में महंगाई को बढ़ावा: जब किसी वस्तु पर टैरिफ लगाया जाता है, तो उस वस्तु की लागत बढ़ जाती है। भारत से आने वाले सस्ते उत्पादों पर टैरिफ लगने क...

क्या भारत और अमेरिकी ट्रेड वॉर की असली वजह 'De-dollarisation' का खतरा ?

अमेरिका को सता रहा है डॉलर की वैश्विक हैसियत को खतरा नई दिल्ली (आलोक शर्मा) अमेरिका और भारत के बीच ट्रेड वॉर का प्रमुख कारण क्या है, क्या सच में यह रूस से ऑयल लेने के कारण है या इसके पीछे कोई और कारण है? यह सबसे बड़ा सवाल सबके सामने है। आखिर दुनिया के सामने दो मजबूत दोस्त कैसे दुश्मन बन सकते हैं। क्या भारत-रूस ऑयल डील अमेरिका-भारत ट्रेड वॉर का प्रमुख कारण है? कहने को तो ऊपरी तौर पर दिखने वाला यह एक कारण है, लेकिन पूर्ण रूप से यही कारण नहीं है। भारत रूस से कच्चा तेल इसलिए खरीद रहा है क्योंकि यह भारत को सस्ते दामों में मिल रहा है, जिससे भारत अपने नागरिकों को राहत दे पा रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद अमेरिका चाहता है कि रूस की अर्थव्यवस्था को किसी तरह का सपोर्ट न मिले, लेकिन भारत ने अपने हितों को प्राथमिकता दी — जो किसी भी संप्रभु राष्ट्र का अधिकार है। पर इस ट्रेड व...