जयपुर (जितेन्द्र सिंह शेखावत) अष्ट सिद्धि और नवनिधि के हिसाब से वास्तु और शिल्प के तहत सलीके से बसें जयपुर का आज स्थापना दिवस है। ब्रह्मांड के सप्त ऋषि मंडल यानी भगवान सूर्य रथ के सात घोड़ों की तर्ज पर सात दरवाजे बनाए गए। अब परकोटे को तोड़कर रास्ते निकालने से न्यू गेट आदि कई नए रास्ते और दरवाजे बन गए हैं।
चांदपोल दरवाजे से सूरजपोल दरवाजे तक की लंबाई दो मील चालीस गज है। इस रास्ते के बीच तीन चौपड़े बनाई गई। छोटी चौपड़ पर माता सरस्वती को विराजमान कर सरस्वती के उपासक विद्वानों और ब्राह्मणों को पुरानी बस्ती व ब्रम्हपुरी चौकड़ी में बसाया गया।
दूसरी चौपड़ जिसका नाम माणक चौक चौपड़ है। यहां पर महालक्ष्मी माता का स्थान मान कर देश के जाने-माने जौहरी आदि व्यापारियों को बुलाकर बसाया गया। इससे जुड़े बाजार का नाम जौहरी बाजार रखा गया। बड़ी चौपड़ के खंदे में द्रविड़ शिल्प शैली में लक्ष्मी नारायण भगवान् का मंदिर भी बनाया गया। यह मंदिर सवाई जयसिंह की पुत्री बाईजी विचित्र कंवर ने बनवाया था। इसलिए इस मंदिर का नाम बाईजी लक्ष्मी नारायण मंदिर जी के नाम से जाना जाता है।
माता महाकाली का स्थान रामगंज की चौपड़ को माना गया। इस चौपड़ के इर्द-गिर्द युद्ध में लड़ने वालों को बसाया गया। इसमें चौकड़ी तोपखाना हजूरी भी है । जिसमें तोप चलाने वाले और युद्ध में काम आने वाले हाथी घोड़े आदि रखने वालों को बसाया गया। वहीं वर्तमान में घाटगेट आरएसी लाइन की जगह पर सेना की बड़ी सैनिक छावनी रखी गई।
गंगापोल चौकड़ी में युद्ध में लड़ने वाल सामंतों को बसाया गया। वास्तु शिल्प के महाविज्ञानी पंडित विद्याधर चक्रवर्ती और मिस्त्री आनंद राम ने सृष्टि के नव निधि सिद्धांत को आधार मान कर नगर के चारों तरफ सुरक्षा के लिए नौ वर्ग मील परकोटा और नौ चौकड़ियों में नगर को बसाया। सड़कों की चौड़ाई भी 27 गज, 18 गज और नौ गज रखी गई। इनके अंको को जोड़ने पर नौ आता है। सातों दरवाजों में सुरक्षा के लिहाज से तांत्रिक प्रयोग से मारुति वीर और प्राचीरों पर काल भैरव नाथ की स्थापना की गई। नगर नियोजन में वर्ग और वृत्त को महत्व दिया गया। चीन के नगरों में गोयाटा, चांगगांग या और बगदाद नगरों की तर्ज पर वृत्ताकार सिद्धांत को अपनाया गया । यह सिद्धांत प्रजा निवास के लिए उत्तम माना जाता है । राजगुरु रत्नाकर पुंडरीक, जगन्नाथ सम्राट, दीवान नंदराम, कवि आत्माराम और विद्याधर चक्रवर्ती जैसे विद्वानों का नगर बसाने में विशेष योगदान रहा। मुगल साम्राज्य कमजोर पड़ने लगा तब सवाई जयसिंह ने नई राजधानी बनाने की सौची। वे शिकार खेलने तालकटोरा के स्थान पर आया करते थे। तब उन्होंने इस स्थान को नगर बसाने के लिए उपयुक्त माना। सबसे पहले उन्होंने तालकटोरा के पास बादल महल बनवा कर जय निवास उद्यान बनाया। इसके बाद सूरज महल बनवाया। सूरज महल में भगवान् गोविन्द देव जी विराजे है। दीवान नंदराम की 16 जुलाई 1726 की रिपोर्ट के मुताबिक द्रव्यवती नदी से चांदपोल होते हुए पानी की नहर निकाली गई। कारोबार के हिसाब से मोहल्लों को बसाया गया। जयपुर की नीव लगने के एक साल बाद सवाई जयसिंह द्वितीय आमेर राज दरबार के सभासद कवि आत्माराम के साथ नगर का निरीक्षण करने निकले थे। कवि आत्मा राम ने "जयसिंह सुजस प्रकाश" में जयपुर का आंखों देखे वर्णन में जयपुर नगर को सबसे सुंदर, समृद्ध और नगरों का सरताज बताया है। कवि ने लिखा है कि दूसरे शहरों से यहां आकर बस रहे धनपति सेठों, विद्वानों, कुशल हस्तशिल्पयों की हवेलियां और राजकीय भवनों से यह नगर सुशोभित है।
विष्णु और कृष्ण के मंदिरों की छवि मनोहर लगती है। हवेलियों में शुद्ध हवा रोशनी और स्वच्छ पेयजल का इंतजाम है।चांदपोल से बाजारों में निकली द्रव्यवती की नहर पाप ताप हारिनी सरिता समान है। जयपुर का मुकाबला लाहौर, दिल्ली, आगरा और सिंध जैसे शहर भी नहीं कर सकते हैं। बाजारों में दौड़ते ऊंट जहाजों से दिखाई देते हैं । पगड़ीयों में सज्जित सेठ उमराव से कम नहीं लगते। विलायत का महीन कपड़ा और काबुल और जलालाबाद के सूखे मेवों से बाजार सजे हैं। महा घटों में देसी घी, उंट की खाल के बने सिंधडों में घाणी का तेल भरा है। गुड़ का राब मटको में बिकता है। बाजारों में देश-विदेश के व्यापारियों का जमघट है। कई स्थानों पर घोड़ों को प्रशिक्षित किया जा रहा है। त्रिपोलिया बाजार में अस्त्र शस्त्रों का निर्माण हो रहा है। पशु हटवाड़ा में अनेक नस्ल के बैल बिकने आए हैं । रुई, लोई, कंबल और सांभर का नमक बिक रहा है। नीलम पारसों के अलावा जौहरियों में हीरो और लाल मणियों के हार दमकते हैं। सोने चांदी का वर्क, जरी के कपड़ों में अनूठी सुनहरी सजावट है। कागज और जूतियां बनाने वाले मोची भी अपने काम में व्यस्त है। हलवाईयों के यहां मिठाईयां और अचार है। सुगंधियों में इत्र, फुलेल की महक है। ठठरे बर्तन और सिलावट सिल्ला लोढ़ी बना रहे हैं। ब्रह्मपुरी की हवेलियों मैं निवास करने वाले विद्वान पंडित पंडित पंडितों की वाणी धार्मिक श्लोकों से गूंज रही है यहां हवन यज्ञ की धूम से सारा वातावरण सुभाषित है। जयसागर और तालकटोरा सरोवर के किनारे पर सुंदर महल खड़े हैं। जय सागर अब खत्म हो चुका और इसमें जनता बाजार बस गया है।