वियतनाम युद्ध: कैसे अमेरिका की सबसे लंबी लड़ाई बनी उसकी सबसे बड़ी रणनीतिक हार


US-Israel Attacks Iran : (आलोक शर्मा) क्या ट्रंप की हठधर्मिता अमेरिका के नाम वियतनाम युद्ध जैसी एक और रणनीतिक असफलता की कहानी लिखने जा रही है। विदेश और युद्ध मामलों के जानकार लगातार यह सवाल उठा रहे हैं। कारण साफ है जिस ईरान में अमेरिका इजरायल के साथ 2 से 3 तीन के युद्ध को ध्यान में रखकर आगे बढा था अब वही युद्ध एक माह से ज्यादा चलने की आशंका जताई जाने लगी है। ट्रंप अपने इरादों में सफल हो या न हों लेकिन मीडिल ईस्ट के कई देशों को ट्रंप की हठधर्मिता ने बैठे बिठाएं युद्ध में धकेल दिया है, जबकि अमेरिका खुद के देश को इससे बचाए हुए हजारों किलामीटर दूर बैठा हुआ है। उसके देश में अभी तक एक भी ईरानी हमला नहीं हुआ है या यों कहें उसकी सीमाओं के आसपास भी नहीं पहुंचा है। लेकिन क्या सिर्फ हठधर्मिता के चलते ट्रंप ने एक गलत समय पर एक गलत फैसला कर लिया जिसे अब वह लाखों करोड़ों लोगों की जान युद्ध में धकेलकर खुद को सही साबित करने में लगे हैं। ऐसे में एक बार फिर वियतनाम युद्ध याद आने लगा है। 

वियतनाम युद्ध 1955 से 1975 के बीच लड़ा गया एक लंबा और विनाशकारी संघर्ष था, जिसमें उत्तर वियतनाम के कम्युनिस्ट नेता हो ची मिन्ह के नेतृत्व वाली सेनाएँ दक्षिण वियतनाम की अमेरिका समर्थित सरकार के खिलाफ लड़ीं। शीत युद्ध के दौर में संयुक्त राज्य अमेरिका को डर था कि यदि वियतनाम कम्युनिस्ट हो गया तो पूरे दक्षिण-पूर्व एशिया में कम्युनिज़्म फैल जाएगा, जिसे “डोमिनो थ्योरी” कहा गया। इसी सोच के तहत अमेरिका ने 1960 के दशक में सीधे सैन्य हस्तक्षेप किया और लाखों सैनिक भेजे, लेकिन उसे घने जंगलों में गुरिल्ला युद्ध, स्थानीय समर्थन की कमी और बढ़ती जनहानि का सामना करना पड़ा। 1968 के टेट ऑफेंसिव ने स्पष्ट कर दिया कि युद्ध जल्दी खत्म नहीं होगा, जिससे अमेरिकी जनता का भरोसा डगमगाया और देशभर में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू हुए। भारी आर्थिक बोझ, लगभग 58,000 अमेरिकी सैनिकों की मौत और राजनीतिक दबाव के कारण अंततः 1973 में अमेरिका को सैनिक वापस बुलाने पड़े, और 1975 में उत्तर वियतनाम ने सैगॉन पर कब्ज़ा कर देश का एकीकरण कर लिया। इस युद्ध के बाद अमेरिका की वैश्विक स्तर पर आलोचना हुई, क्योंकि उस पर अनावश्यक हस्तक्षेप, नागरिकों की बड़ी संख्या में मौत और जनता से पूरी सच्चाई छिपाने के आरोप लगे। साथ ही यह पहली बार था जब उसे स्पष्ट सैन्य असफलता का सामना करना पड़ा, जिसने उसकी अंतरराष्ट्रीय छवि और विदेश नीति पर गहरा असर डाला। ऐसे में सवाल उठना लाजमी है कि कहीं ग्लोबल तनाव और मध्य-पूर्व संघर्ष के बीच अमेरिका फिर से वियतनाम की कहानी तो नहीं दोहरा रहा।